कैराना ।कस्बा के मोहल्ला अंसारियान में स्थित इमाम बारगाह कलां व खुर्द में माह-ए-सफ़र के अशरा-ए-सानी के बाद शोहदा-ए-करबला के चेहल्लुम पर इमाम बारगाह कलां में मौलाना मोहम्मद मियां और इमाम बारगाह खुर्द में मौलाना रईसुल हसन व मौलाना नदीम हैदर ने मजलिस-ए-अज़ा को ख़िताब (संबोधित) किया। शब-ए-अज़ा को अज़ादारों के अज़ाख़ाने में जुलूस की मजलिस बपा (आयोजित) हुई। फिर हज़रत अब्बास का अलम और ज़ुलजिनाह व ताज़िया नोहा ख्वानों और मातमदारों के साथ सहपहर (दोपहर बाद) वहां पहुंचा। इसी तरह इमाम बारगाह कलां से ताज़िया और अलम का जुलूस नोहा ख्वानों व मातमदारों के साथ सहपहर वहां पहुंचा। दिन में ताज़िए का जुलूस दोपहर के समय इमाम बारगाह खुर्द से बरामद हुआ जो सहपहर होता हुआ बड़ी इमाम बारगाह के चौक पर पहुंचा। दूसरा जुलूस बड़ी इमाम बारगाह से मर्सिया ख्वानों के साथ इमाम बारगाह के चौक पहुंचा, जहां ज़ायरीन (दर्शनार्थियों) ने ज़ियारत का शर्फ़ हासिल किया।सैयद फ़ैज़ हसन काज़मी के अज़ाख़ाने से 18 बनी हाशिम की शबीह (प्रतीक) बरामद हुई। फिर सैयद इब्ने हसन काज़मी के अज़ाख़ाने से ज़ुलजिनाह बरामद हुआ, जिसकी ज़ायरीन ने ज़ियारत की। मजलिस में वसी हैदर, साक़ी हसन, हैदर और मुदस्सिर ज़ैदी ने मर्सिया ख्वानी की। जबकि क़ुर्रतुल ऐन, सुघरा, गुलज़ार अली, मोहम्मद जाफ़र, अमीर हैदर, मोहम्मद अफ़ज़ल, मुत्तकी और मोहम्मद आग़ा हैदर महदी ने नोहा ख्वानी की। मजलिस में उलेमा-ए-दीन ने शोहदा-ए-करबला और उन पर ढाए गए मसायब (अत्याचारों) का बयान किया, जिसे सुनकर अकीदतमंद (श्रद्धालु) ज़ार-ओ-क़तार (फूट-फूट कर) रो पड़े।
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