कस्बे के मोहल्ला छड़ियान के निवासियों ने आपातकाल के दौरान चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान के विरोध में शहीद हुए लोगों की याद में निर्मित ‘शहीद चौक’ का पुनर्निर्माण कराए जाने की मांग उठाई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्मारक क्षेत्र के शहीदों के बलिदान का प्रतीक था, जिसे बाद में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर ध्वस्त कर दिया गया।
प्रख्यात लेखक एवं ‘कैराना कल और आज’ के लेखक मोहम्मद उमर कैरानवी ने बताया कि पूर्व चेयरमैन स्वर्गीय हाजी अब्दुल अज़ीज अंसारी ने लगभग दो दशक पूर्व मोहल्ला छड़ियान स्थित कांधला तिराहे पर शहीदों की स्मृति में ‘शहीद चौक’ का निर्माण कराया था। बाद में एक पूर्व चेयरमैन द्वारा सड़क चौड़ीकरण योजना के तहत इस स्मारक को हटवा दिया गया, जिससे क्षेत्र के लोगों में आज भी निराशा है।
उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौरान जबरन नसबंदी अभियान के खिलाफ हुए जनआंदोलन में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखा टकराव हुआ था। इस संघर्ष में मोहल्ला छड़ियान, दरबार तथा आसपास के क्षेत्रों के एक दर्जन से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। आंदोलन के दौरान गिरफ्तार होकर जेल जाने वाले लोगों को बाद में समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा पेंशन प्रदान की गई थी, जो आज भी ‘स्वतंत्र सेनानी पेंशन’ के रूप में जारी है।
ज्ञात हो कि वर्ष 1975 से 1977 के बीच लागू आपातकाल के दौरान चलाया गया जबरन नसबंदी अभियान भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे विवादास्पद और काले अध्यायों में गिना जाता है। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर चलाए गए इस अभियान में कई स्थानों पर लोगों की जबरन नसबंदी कराए जाने के आरोप लगे थे, जिसके चलते व्यापक जनाक्रोश पैदा हुआ था।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विशेषकर मुजफ्फरनगर और आसपास के क्षेत्रों में इस नीति के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार 18 अक्टूबर 1976 को मुजफ्फरनगर के खालापार और अन्य क्षेत्रों में जबरन नसबंदी के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में कई लोगों की मौत हो गई थी। यह घटना बाद में ‘मुजफ्फरनगर नसबंदी गोलीकांड’ के नाम से प्रसिद्ध हुई और आपातकाल के दमनकारी दौर की एक महत्वपूर्ण मिसाल मानी जाती है।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जबरन नसबंदी आंदोलन के शहीदों का बलिदान इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इसलिए उनकी स्मृति में निर्मित ‘शहीद चौक’ का पुनर्निर्माण कराया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपने इतिहास, विरासत और पूर्वजों के संघर्ष एवं बलिदान से परिचित हो सके।

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